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मां दंतेश्वरी मंदिर में सदियों पुरानी परंपरा, रक्षाबंधन से पहले चढ़ाया जाता है विशेष सूती व रेशमी रक्षा धागा

28 अगस्त 2026

दंतेवाड़ा : दक्षिण बस्तर के प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां दंतेश्वरी मंदिर में रक्षाबंधन पर्व को लेकर एक अनूठी और सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरी आस्था के साथ निभाई जा रही है। रक्षाबंधन पर्व से पूर्व, मंदिर मे

मां दंतेश्वरी मंदिर में सदियों पुरानी परंपरा, रक्षाबंधन से पहले चढ़ाया जाता है विशेष सूती व रेशमी रक्षा धागा

दंतेवाड़ा : रक्षाबंधन पर्व से दो दिन पूर्व मंदिर के 12 नंगवार सदस्यों, सेवादारों तथा सदियों से इस परंपरा को निभा रहे तुड़पा परिवार (जिसके सदस्य मादरी राउत भंडारी हैं) द्वारा कच्चे रेशम और कॉटन के धागों को खास तरीके से काता, रंगा और गूंथा जाता हैधागा तैयार होने के पश्चात इसे विधि-विधान के साथ पवित्र 'माई शीतला सरोवर' ले जाया जाता है। वहाँ सरोवर के पवित्र जल से रक्षा सूत्र का अभिषेक किया जाता है और विशेष पूजा-अर्चना संपन्न होती है। इसके बाद इसे मां दंतेश्वरी के श्रीचरणों में अर्पित किया जाता है।रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले मंदिर परिसर में 'राखी' के नाम से एक विशेष एवं भव्य आरती का आयोजन होता है। इस दौरान मां दंतेश्वरी, भैरव देव और मंदिर परिसर में स्थापित सभी देवी-देवताओं को यह पवित्र रक्षा सूत्र चढ़ाया जाता है।पूजा के पश्चात इस पावन रक्षा सूत्र को प्रसाद के रूप में सभी श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। बस्तर क्षेत्र में देवी मां के प्रति असीम और अटूट श्रद्धा है। यहाँ की परंपरा के अनुसार, बहनों द्वारा भाइयों की कलाई पर राखी बांधने के अलावा, क्षेत्रवासी इस रक्षा धागे को अपने घरों के मुख्य द्वार, गाड़ियों और गाय-मवेशियों पर भी बांधते हैं। लोगों का प्रगाढ़ विश्वास है कि मां दंतेश्वरी का यह रक्षा सूत्र सभी प्रकार के विघ्न, बाधाओं और संकटों से उनकी रक्षा करता है। मंदिर के 12 नंगवार के सदस्यों, सेवादारों और तुड़पा परिवार (मादरी राउत भंडारी) द्वारा हाथ से काता और तैयार किया गया सूती व रेशमी रक्षा सूत्र बनाया जाता है। रक्षा धागे को निर्माण के बाद पवित्र माई शीतला सरोवर के जल से विधि-विधानपूर्वक अभिषेक और पूजा-अर्चना की जाती है। रक्षाबंधन से एक दिन पूर्व मंदिर परिसर में एक विशेष भव्य आरती का आयोजन होता है, जिसमें माई जी, भैरव जी और अन्य सभी देवी-देवताओं को यह रक्षा सूत्र (राखी) चढ़ाया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद इस रक्षा धागे को प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में बांटा जाता है। बस्तर क्षेत्र के लोग इसे अपने हाथों, घरों, गाड़ियों तथा मवेशियों (गाय-बैल) में बांधकर विघ्न-बाधाओं से रक्षा की कामना करते हैं।


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Vijay Vijay

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