शिल्पकार रामचंद्र नेताम ने लगभग 17 वर्ष पूर्व इस पारंपरिक कला को नया स्वरूप देने का निर्णय लिया था। सामान्यतः बेलमेटल कला में पूरी मूर्ति मिट्टी के सांचे और मोम (लॉस्ट वैक्स कास्टिंग तकनीक) की मदद से तैयार की जाती है। हालांकि, रामचंद्र ने नदी के पत्थरों के स्वाभाविक आकार और बनावट को बेलमेटल के साथ संयोजित कर कला को एक नया आयाम दिया। सोनाबाल स्थित सार्वजनिक हस्तशिल्प सुविधा केंद्र में वे अपने सहयोगियों के साथ मिलकर इन कलाकृतियों का निर्माण कर रहे हैं। पत्थर और धातु का यह संगम बस्तर के पारंपरिक शिल्प को एक आधुनिक और आकर्षक पहचान दिला रहा है रामचंद्र नेताम केवल स्वयं तक इस कला को सीमित नहीं रख रहे हैं, बल्कि बस्तर की इस अनूठी सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए युवा पीढ़ी को इसका प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। उनका यह प्रयास कोंडागांव के हस्तशिल्प को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।
बेलमेटल (डोकरा) शिल्प की मुख्य विशेषताएं:
- प्राचीन ढलाई पद्धति: यह कला पूर्णतः 'लॉस्ट वैक्स कास्टिंग' (मोम ढलाई) तकनीक पर आधारित है।
- पारंपरिक विषय-वस्तु: इसमें स्थानीय देवी-देवताओं, प्रकृति, पशु-पक्षियों तथा आदिवासी जनजीवन की विविध झांकियों को उकेरा जाता है।
- प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग: निर्माण प्रक्रिया में मुख्य रूप से पीतल, कांस्य, प्राकृतिक मोम और मिट्टी का प्रयोग होता है।
- नवाचार: प्राकृतिक पत्थरों के उपयोग ने इस पारंपरिक कला को और अधिक टिकाऊ, अनूठा और आकर्षक बना दिया है।